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धनवान भिखारी

    कभी - कभी कुछ घटनाएं  हमारे सामने ऐसी घटित हो जाती हैं,जो आजीवन अविस्मरणीय हो जाती हैं और ऐसी सीख दे जाती हैं जो हम सीखने की कोशिश करने पर भी नहीं सीख पाते।        उस दिन रविवार था , और हमेशा की तरह मेरी सुबह दोपहर को ही हुई थी। रूम में मैं अकेला ही था तो खाना बनाने की इच्छा नहीं हो रही थी। ज्यादा सो कर थक गया था तो थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं भोजनालय की ओर निकल पड़ा।         वहां पहुंचने पर पता चला कि अभी कुछ विलम्ब है । मुझे थोड़ी देर बाद आने को कहा गया , लेकिन आलसी मनुष्य होने का कर्तव्य निर्वहन करते हुए मैं वहीं बाहर रखी कुर्सी पर आराम से बैठ गया और इंतजार करना ज्यादा उचित समझा। और अलसाई हुई आंखों से इधर-उधर देख ही रहा था  कि सामने से एक वृद्ध विकलांग भिखारी  जो ठीक से चल भी नहीं पा रहा था एक लाठी के सहारे धीरे धीरे इसी भोजनालय की ओर आ रहा था तब मेरा कोई विशेष ध्यान उस पर नहीं गया था। पास आया तो मैंने देखा कि उसके पास एक पैकेट बिस्किट थी और ऐसा लग रहा था कि वह अभी तक भूखा है कुछ नहीं खाया है। वह अपनी लाचार...

दोहे : परीक्षा की तैयारी

-लेना शुरू कर दीजिए, अपने प्रभु का नाम । पेपर शुरू अब हो गए, आयेंगे वे काम ।१। आओ मेरे साथियों, हो जाओ तैयार । पुस्तक को कवच बनाइए, कलम बने हथियार ।२। चौबीस घंटे का सिस्टम, सोच लिया अब जाय । जो भी बुक नहि पास में, उन्हें खरीदा जाय ।३। पहले दिन की उत्सुकता,पूरा दिन लिए सोय । यही सोचकर रात में, अधिक पढ़ाई होय ।४। पूरे दिन अपने अंदर,समझाते यह बात । दो नींद के होते ही, आय गई वो रात ।५। तीस मिनट तो प्रेम से, लिये पेज पलटाय । बोला 'अंदर' से कोई, अब चाय हो जाय ।६। फिर आते हैं मुद्दे पर, लिए किताब को खोल । तब मोबाइल उछल पड़ा, मुझसे भी कुछ  बोल ।७। फेसबुक ट्विटर एप्प्स फिर, व्हाट्सएप इंस्टाग्राम । इनमें दिल फिर रम गया, भूले अपना काम ।८। कल से पक्का पढ़ लेंगे, लिये यही फिर ठान । तान रजाई सो गये,ठीक समय को जान ।९। समय और हम खेलते, रोज यही अब खेल । कल पेपर से सामना, और हमारा मेल ।१०।                      -   पंकज नयन गौतम

अरे यार! समय नहीं है

ये है क्या, जो किसी के पास नहीं है, पास होते हुए भी यह, पता नहीं क्यों नहीं है हमेशा जिसे देखो तब, अरे यार समय नही है । यदि समय नही है तो कैसे कर लेते हो कुछ, इस चीज़ के लिए नहीं तो किसके लिए बहुत कुछ, नही बताया उसने क्योंकि अरे यार समय नहीं है। समय भी कैसा है ये दूसरों के लिए तो है, जिनसे है मात्र दिखावा, ऐसा नहीं कि और नहीं है बात अपनों की हो तो, अरे यार समय नहीं है। है किसके पास कहीं ऐसा तो नही है कि इसका वजूद ही नहीं, लेकिन ऐसा तो नहीं है, ढूंढ़ेंगे हम इसे लेकिन, अरे यार समय नहीं है।  चलो ठीक है, मान लेते हैं कि नहीं है, कुछ तुम निकालो कुछ मैं, हां, ये बिल्कुल सही है इतना भी न हुआ क्योंकि अरे यार समय नहीं है। ये समय है बस इसे पहचान लो तुम निकालोगे जरूर मेरे लिए थोड़ा जल्दी, जान तो तुम कहीं मैं भी न बोल दूँ कि अरे यार समय नहीं है।               -पंकज 'नयन' गौतम

ज़िन्दगी

करना पड़ता है वो भी, जो नहीं चाहते हम कभी। बस इसी मज़बूरी का तो नाम ज़िन्दगी है। सफल होना मक़सद नही,असफल भी होते हैं हम, बस इसके लिए किया गया काम ज़िन्दगी है। अपना गांव छोड़े, घर वार छोड़े, पर याद संजोए हुए हैं,,, अब फिर लौट आने का इंतजाम ज़िन्दगी है। रख कर दिमाग अपने घर में, निकल जाते थे दोस्तों के साथ, बस वही 'अनमोल' सुबह और शाम ज़िन्दगी है। हंसना, रोना, खाना ,सोना सबमें कुछ 'अलग' ही मज़ा था । घर में थे तो इस 'सफर' के बारे में सोचना भी सज़ा था। बस इसी पल तक हम अनजान थे 'इस' ज़िन्दगी से, 'वो' सुकून से किया गया 'आराम' ज़िन्दगी है। अब निकले हैं अनजाने सफर पर, कुछ तय करके पैमाने, ये 'करना' है और ये 'नहीं करना' , लगे खुद को समझाने , जो 'किये'  और जो 'नहीं किये' सब बन गए ज़िन्दगी के 'किस्से'; अब जो भी हम हासिल करेंगे, वही मुक़ाम ज़िन्दगी है।

काश ! हार गया होता

  ( जीत की ऊंचाई पर      आज अकेले बैठे हुए      बीते लम्हों को याद कर      खुद से ही  छिपाकर      आज मैं सोचता हूं      काश ! हार गया होता ।।      जाने क्यों  खुश था      उस लमहे को जीत कर      उसकी हार तो जीत थी      मेरी जीत को हार मान      आज मैं सोचता हूं      काश ! हार गया होता ।।      आखिर क्या थी वजह      उससे ही जीतने की      जो खुद ही हार कर      खुश था मेरी जीत पर      तो आज मैं सोचता हूं      काश ! हार गया होता ।।      शायद जानता ना था      या अनजान था जानकर      खुद को साबित करने की      उस गलती को मान कर      आज मैं सोचता हूं      काश ! हार गया होता ।।      चलना है आगे अब ...