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दो पक्षी

 - वृक्ष की डालियों पर, मनमोहक दृश्य पक्षियों का, शोर, उनका कलरव व स्वच्छंदता, देखती हुई बंद कक्ष के झरोखों से  किसी कल्पना लोक में थी प्रेमिका। हतप्रभ थी वह इस बात पर, कि क्यों नहीं हो पा रहा निश्चय उन पक्षियों के सभी जोड़ों में, उनके स्त्रीत्व व पुरुषत्व का । उसके स्वयं के अनुभव ऐसे तो बिल्कुल न थे चूंकि जरूरी है प्रमाण समाज का ।। उसे फिर तनिक असहज लगा, अनेक पक्षियों का झुंड था क्या नहीं इज्जत कोई उनके समाज की, क्यों नहीं आया कोई पर उनके कुतरने, स्वतंत्र एवं प्रेम से उड़ते हुए पक्षियों का। वे उड़ते जा रहे सुदूर आकाश में, प्रसन्नता से युक्त उनकी चहचहाहट, प्रेम का तो अर्थ होता है यही कल्पना मात्र से मुस्कुरा रही वह प्रेमिका। हालांकि उसके स्वयं के साथ के अनुभव ऐसे तो बिल्कुल न थे पर उतरना तो काम है उसके समाज का ।। उन्मुक्त से होने लगे विचार उसके, भय युक्त होकर भी लगी वह मुक्त सी, उगेंगे पंख एक दिन फिर कभी, उड़ जाएंगे गगन के उस पार तक, और हाथ में होगा हाथ उसके 'साथ' का। फिर अचानक गिर पड़ा उसका महल, बन ही रहा था जो उसके विचार में, कुछ लोग पास आते दिखे उस वृक्ष के, कुछ अस्त्र हाथों
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आश्रय

- आश्रय रात का अंधेरा ओझल कर एक दुनिया को, जगा सा देता है उस जहां को जहां दिन के उजाले में बस अभिनय हो पाता है । सुनसान तब समय, वरीयता देता है, छोटी सी आवाज को स्मृतियों को, अपने मौलिक विचार को, सुलझती हैं कई ध्वनियां उन उलझी खामोशियों से । रात का अंधेरा देता है आश्रय, अनियोजित मुस्कुराहट को, बहुप्रतीक्षित उस स्वतंत्रता को जहां निषिद्ध नहीं है बहना,  पुरुष के आंसुओं को ।।                          - पंकज नयन गौतम

उलझन

- जैसे आहिस्ते से अलग होती नदियां पहाड़ों से, दूर जाती हुई वो धुन जब धीरे से अलग होतें है वीणा के तार, या फिर वो सुलझी हुई पहेलियाँ जो शायद रहना चाहती हैं सदा उलझन में, या आहिस्ता मंडराता हुआ पंछी जो भी सोचता है जब हटाया जाता है उसका आशियाँ, कल सुलझती हुई तुम्हारी उंगलियां  अंगुलियों से मेरी उलझे रहना चाहती थीं , नहीं हुआ ऐसा शायद नदी को उम्मीद हो कि यही पर्वत बनेगा समुन्दर एक दिन जो करेगा इंतज़ार मुझे खुद में विलय करने को ।।      - पंकज 'नयन' गौतम

अधिकार

मधुमक्खियां मास के एक पक्ष भर दूसरे पक्ष के लिए भटकतीं पुष्प-पुष्प पर रसों को संजोह कर  कर्तव्य पालते हुए मधु बनाती हैं। बारी अब अधिकार की जो जीविका निमित्त थी तब दुष्ट मानव ने उनको ही वंचित कर सारा कोष शून्य कर दिया यहीं तलक रुके नहीं कल कर दिए सभा गठित जिसमे विषय यही बना कि ''मधुमक्खियों के कोष में  क्या उनका अधिकार न था''          -पंकज नयन गौतम

आलिंगन

  सुबह की धूप सा इश्क़ तेरा और ओस की बूंदों सा मैं आलिंगन की अंतिम परिणति मिल जाऊँ बस तुझमे मैं ।।        -पंकज नयन गौतम

राब्ता खुद से

खाली इस वक्त में ढूँढ़ते हैं खुद को, लफ़्ज़ों को बांधकर बेसुध हो तन से, करता हूँ खयाल उस वीरान वक़्त में जब साथ की दरकार थी, असहाय से दरख्त कर दैव को पुकारता इन्तजार तो यूँ था जो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो, सहसा कुछ इनायत हुई रंजिशें हुई ख़तम उसी को तो ढूंढ़ता जिसने किया ये था तब मुक़म्मल हुई अब आरजू मिला जो वक्त ढेर सा हुआ जो राब्ता खुद से तो पता चला वो मैं खुद ही था ।।              -पंकज नयन गौतम

गाँव

  गाँव' जब सुनते हैं ये शब्द तो क्या आते हैं ख़्याल, खुद में मगन वो नदियां पानी से भरे तालाब, हरी भरी पगडंडी पर मुस्काते हुए किसान । पर जाते हैं जब 'गांव' अस्तित्व से जूझती नदियां खाली से पड़े तालाब वीरान पड़ी गलियों पर सिसक रहा किसान।।   -पंकज नयन गौतम

आशियाँ

  तिनकों से बुना था जो आशियाँ , उसे छोंड़  दूर दाना चुगते हैं । यहां हर पग जाल बहेलिये का, चल छोड़ परिंदे घर चलते हैं ।।              -पंकज नयन गौतम

उम्मीद

  अब उम्मीद को भी, लगने लगी हैं हमसे ही उम्मीद । कि यदि हमने ही, उम्मीद पर से, उठा लिया उम्मीद, तो छोड़ ही देगा,  उम्मीद खुद से - खुद की ही उम्मीद। उम्मीद की ख़ातिर, बस थोड़ा सा कर लें क्या उम्मीद उम्मीद है शायद उम्मीद की भी बची रहे उम्मीद।। -पंकज नयन गौतम