Skip to main content

एक ख्वाहिश


जो संजोए हूँ वर्षों से, उसे खोना चाहता हूँ,

इन 'आवाजो' से खाली मैं होना चाहता हूँ,
थक गया हूँ अब इन भावों को ढोते- ढोते,
अब हवाओं में खुलकर मैं रोना चाहता हूँ।।

कर दिया हूँ अलग सुख और दुख को बहुत,

फिर  इनको एक साथ, पिरोना चाहता हूँ ।
खुलके हंसता हूँ खुशियों में मैं जिस तरह,
कष्ट में भी उस तरह , मैं रोना चाहता हूँ।।

अरसों हो गए हैं मुझको तो सोए हुए,

उन्मुक्त नींद ही अब, मैं सोना चाहता हूँ।
बस तलाश जारी है उपयुक्त बिछौने की,
उस तकिए के सहारे, मैं रोना चाहता हूँ।।

दिल तो भीगा हुआ है आँसुओं से मगर,

अब पलकों को भी , भिगोना चाहता हूँ।
थक गया हूँ नाटक में यूं चलते चलते,
एक ही है ख्वाहिश, मैं रोना चाहता हूँ।।

                   - Pankaj Nayan Gautam


Comments

  1. Replies
    1. धन्यवाद भ्रातेश्री ,प्रणाम🙏

      Delete
  2. Replies
    1. यह भी तो एक स्वाभाविक गुण है

      Delete
    2. कबहू नही रोई न तो एसे लागा करत है कि 'रोमय' के साथ नागा न होय।

      Delete
  3. "अन्तर्मन का कौतूहल"....!!☺️

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

राब्ता खुद से

खाली इस वक्त में ढूँढ़ते हैं खुद को, लफ़्ज़ों को बांधकर बेसुध हो तन से, करता हूँ खयाल उस वीरान वक़्त में जब साथ की दरकार थी, असहाय से दरख्त कर दैव को पुकारता इन्तजार तो यूँ था जो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो, सहसा कुछ इनायत हुई रंजिशें हुई ख़तम उसी को तो ढूंढ़ता जिसने किया ये था तब मुक़म्मल हुई अब आरजू मिला जो वक्त ढेर सा हुआ जो राब्ता खुद से तो पता चला वो मैं खुद ही था ।।              -पंकज नयन गौतम

तू सत्य का सामना कर

बस छोड़ दे संसार को, न सोच तू व्यवहार को, ना मोह के विचार को, बस एक ही उपासना कर, तू सत्य का सामना कर ।। जो हो चुका, वो हो चुका, जो हो रहा, वह हो रहा, जो होना है, वो होना है, इनसे व्यथित खुद को ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। 'खुशी', बस एक शब्द मात्र, 'दुःख' भी है एक शब्द मात्र, अभिनय करते तो नाट्यपात्र, रोया ना कर, तू हँसा ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। तू बन जा अब तो उदासीन, भव बैठक से हो निरासीन, रहना होगा अब शून्यलीन, अब बस यही आराधना कर, तू सत्य का सामना कर ।। सत्य क्या है? , 'कुछ नहीं' ये अनंत है ये शून्य ही, यह तो स्वयं भगवान ही, अन्यत्र अब जाया न कर, तू सत्य का सामना कर ।।                      - पंकज नयन गौतम

परिवर्तन

  मेरे दुःख और पीड़ा की तीव्रता, तब तुमको पुकारती आवाज, सब बिल्कुल वैसी ही हैं । जो कुछ भी बदल गया अब वो हैं तुम्हारी संवेदनायें , तब तो अनुभव करती थीं क्षणिक भर का भी परिवर्तन, अब तो सब रिक्त सा है, तुम्हारा मेरे प्रति अंतर्मन ।।          - पंकज नयन गौतम