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राब्ता खुद से



खाली इस वक्त में
ढूँढ़ते हैं खुद को,
लफ़्ज़ों को बांधकर
बेसुध हो तन से,
करता हूँ खयाल
उस वीरान वक़्त में
जब साथ की दरकार थी,
असहाय से दरख्त कर
दैव को पुकारता
इन्तजार तो यूँ था
जो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो,
सहसा कुछ इनायत हुई
रंजिशें हुई ख़तम
उसी को तो ढूंढ़ता
जिसने किया ये था तब
मुक़म्मल हुई अब आरजू
मिला जो वक्त ढेर सा
हुआ जो राब्ता खुद से तो
पता चला वो मैं खुद ही था ।।

             -पंकज नयन गौतम

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तू सत्य का सामना कर

बस छोड़ दे संसार को, न सोच तू व्यवहार को, ना मोह के विचार को, बस एक ही उपासना कर, तू सत्य का सामना कर ।। जो हो चुका, वो हो चुका, जो हो रहा, वह हो रहा, जो होना है, वो होना है, इनसे व्यथित खुद को ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। 'खुशी', बस एक शब्द मात्र, 'दुःख' भी है एक शब्द मात्र, अभिनय करते तो नाट्यपात्र, रोया ना कर, तू हँसा ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। तू बन जा अब तो उदासीन, भव बैठक से हो निरासीन, रहना होगा अब शून्यलीन, अब बस यही आराधना कर, तू सत्य का सामना कर ।। सत्य क्या है? , 'कुछ नहीं' ये अनंत है ये शून्य ही, यह तो स्वयं भगवान ही, अन्यत्र अब जाया न कर, तू सत्य का सामना कर ।।                      - पंकज नयन गौतम

परिवर्तन

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