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ज़िन्दगी

करना पड़ता है वो भी, जो नहीं चाहते हम कभी।
बस इसी मज़बूरी का तो नाम ज़िन्दगी है।
सफल होना मक़सद नही,असफल भी होते हैं हम,
बस इसके लिए किया गया काम ज़िन्दगी है।

अपना गांव छोड़े, घर वार छोड़े, पर याद संजोए हुए हैं,,,
अब फिर लौट आने का इंतजाम ज़िन्दगी है।
रख कर दिमाग अपने घर में, निकल जाते थे दोस्तों के साथ,
बस वही 'अनमोल' सुबह और शाम ज़िन्दगी है।

हंसना, रोना, खाना ,सोना सबमें कुछ 'अलग' ही मज़ा था ।
घर में थे तो इस 'सफर' के बारे में सोचना भी सज़ा था।
बस इसी पल तक हम अनजान थे 'इस' ज़िन्दगी से,
'वो' सुकून से किया गया 'आराम' ज़िन्दगी है।

अब निकले हैं अनजाने सफर पर, कुछ तय करके पैमाने,
ये 'करना' है और ये 'नहीं करना' , लगे खुद को समझाने ,
जो 'किये'  और जो 'नहीं किये' सब बन गए ज़िन्दगी के 'किस्से';
अब जो भी हम हासिल करेंगे, वही मुक़ाम ज़िन्दगी है।

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राब्ता खुद से

खाली इस वक्त में ढूँढ़ते हैं खुद को, लफ़्ज़ों को बांधकर बेसुध हो तन से, करता हूँ खयाल उस वीरान वक़्त में जब साथ की दरकार थी, असहाय से दरख्त कर दैव को पुकारता इन्तजार तो यूँ था जो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो, सहसा कुछ इनायत हुई रंजिशें हुई ख़तम उसी को तो ढूंढ़ता जिसने किया ये था तब मुक़म्मल हुई अब आरजू मिला जो वक्त ढेर सा हुआ जो राब्ता खुद से तो पता चला वो मैं खुद ही था ।।              -पंकज नयन गौतम

तू सत्य का सामना कर

बस छोड़ दे संसार को, न सोच तू व्यवहार को, ना मोह के विचार को, बस एक ही उपासना कर, तू सत्य का सामना कर ।। जो हो चुका, वो हो चुका, जो हो रहा, वह हो रहा, जो होना है, वो होना है, इनसे व्यथित खुद को ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। 'खुशी', बस एक शब्द मात्र, 'दुःख' भी है एक शब्द मात्र, अभिनय करते तो नाट्यपात्र, रोया ना कर, तू हँसा ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। तू बन जा अब तो उदासीन, भव बैठक से हो निरासीन, रहना होगा अब शून्यलीन, अब बस यही आराधना कर, तू सत्य का सामना कर ।। सत्य क्या है? , 'कुछ नहीं' ये अनंत है ये शून्य ही, यह तो स्वयं भगवान ही, अन्यत्र अब जाया न कर, तू सत्य का सामना कर ।।                      - पंकज नयन गौतम

परिवर्तन

  मेरे दुःख और पीड़ा की तीव्रता, तब तुमको पुकारती आवाज, सब बिल्कुल वैसी ही हैं । जो कुछ भी बदल गया अब वो हैं तुम्हारी संवेदनायें , तब तो अनुभव करती थीं क्षणिक भर का भी परिवर्तन, अब तो सब रिक्त सा है, तुम्हारा मेरे प्रति अंतर्मन ।।          - पंकज नयन गौतम