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विंडो सीट



*विंडो सीट*

आज फिर से
छोटे बड़े सभी पेड़
बिना होड़ लगाए
ना ही जीतने को
पीछे की ओर
दौड़े जा रहे हैं ।

आज फिर से
दूर पहाड़ों के पीछे से
लालिमा समेटे हुए
नई उमंग के साथ
सबको उज्ज्वल करने
सूरज निकल रहा है।

आज फिर से
हरे-भरे खेतों पर
चारदीवारी से बाहर
स्वछन्द माहौल में
दिन शुरू करने
किसान टहल रहे हैं।

आज फिर से
खुले हुए आसमां में
सीमाओं से बिना बंधे
विभिन्न समूहों में
एकता दर्शाते हुए
पक्षी चहक रहे हैं।

आज फिर से
मन को आनंदित करती
नव ऊर्जा को भरती
अनवरत बिना थके
प्रफुल्लित करती हुई
पवन चल रही है।

आज फिर से
दो किनारों के बीच
सुंदर नृत्य करती हुई
शांत वातावरण में
संगीत गुनगुनाती हुई
तरंगणी बह रही है।

आज फिर से
बहुत दिनों बाद
मैं निज ग्राम की ओर
प्रस्थान कर रहा हूँ
,
,
हां मैं विंडो सीट पर हूँ।
हां मैं विंडो सीट पर हूँ।।

      - *पंकज नयन गौतम*

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