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उफ़्फ़! ये नींद

जब हम चाहते हैं , तब क्यों नहीं आती है ?
करते हैं लाख कोशिशें, वो भी विफल हो जाती हैं।
लेकिन, जब भी उसका मन हो हम रोक नहीं पाते,
उफ़! क्या बताएं साहब, ये नींद बहुत सताती है ।

क्या समझते हो ? कि हम नहीं चाहते सुबह जागना,
'दूसरी दुनिया' वालों की तरह 'फिटनेस' को भागना,
हमारी दुनिया भी किसी को समझ कहाँ आती है,,,,
उफ़! क्या बताएं साहब, ये नींद बहुत सताती है ।

हाँ, हम भी उठे थे समझौता करके एक प्रातः काल,
गए फिर 'दूसरी दुनिया' में बदलने अपनी चाल,
अरे ये क्या,,,यहाँ तो दूसरी प्रजाति नज़र आती है
उफ़! क्या बताएं साहब, ये नींद बहुत सताती है ।

देखते ही उनको लगा, कि हम भी जीत लेंगे ये 'जंग',
'बेटा तुझसे न हो पायेगा' ,ये कहने लगा  अंतरंग
उस 'इतिहास' की कभी कभी याद आ जाती है।
उफ़! क्या बताएं साहब, ये नींद बहुत सताती है ।

बीत चुके हैं अरसों अब, खुद को बदलते बदलते,
अभी बस उतना ही बदले हैं, जितना 'मरते का न करते',
अब जितनी भी आवाजें आती हैं,यही 'व्यंग्य' सुनाती हैं,
उफ़! क्या बताएं साहब, ये नींद बहुत सताती है ।

                                        -पंकज नयन गौतम













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राब्ता खुद से

खाली इस वक्त में ढूँढ़ते हैं खुद को, लफ़्ज़ों को बांधकर बेसुध हो तन से, करता हूँ खयाल उस वीरान वक़्त में जब साथ की दरकार थी, असहाय से दरख्त कर दैव को पुकारता इन्तजार तो यूँ था जो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो, सहसा कुछ इनायत हुई रंजिशें हुई ख़तम उसी को तो ढूंढ़ता जिसने किया ये था तब मुक़म्मल हुई अब आरजू मिला जो वक्त ढेर सा हुआ जो राब्ता खुद से तो पता चला वो मैं खुद ही था ।।              -पंकज नयन गौतम

तू सत्य का सामना कर

बस छोड़ दे संसार को, न सोच तू व्यवहार को, ना मोह के विचार को, बस एक ही उपासना कर, तू सत्य का सामना कर ।। जो हो चुका, वो हो चुका, जो हो रहा, वह हो रहा, जो होना है, वो होना है, इनसे व्यथित खुद को ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। 'खुशी', बस एक शब्द मात्र, 'दुःख' भी है एक शब्द मात्र, अभिनय करते तो नाट्यपात्र, रोया ना कर, तू हँसा ना कर, तू सत्य का सामना कर ।। तू बन जा अब तो उदासीन, भव बैठक से हो निरासीन, रहना होगा अब शून्यलीन, अब बस यही आराधना कर, तू सत्य का सामना कर ।। सत्य क्या है? , 'कुछ नहीं' ये अनंत है ये शून्य ही, यह तो स्वयं भगवान ही, अन्यत्र अब जाया न कर, तू सत्य का सामना कर ।।                      - पंकज नयन गौतम

परिवर्तन

  मेरे दुःख और पीड़ा की तीव्रता, तब तुमको पुकारती आवाज, सब बिल्कुल वैसी ही हैं । जो कुछ भी बदल गया अब वो हैं तुम्हारी संवेदनायें , तब तो अनुभव करती थीं क्षणिक भर का भी परिवर्तन, अब तो सब रिक्त सा है, तुम्हारा मेरे प्रति अंतर्मन ।।          - पंकज नयन गौतम